Monday, March 22, 2021

खुश कैसे रहें - How to be happy

 खुश रहना कौन नही चाहता है और यही हमारे जिंदगी का मकसद भी होना चाहिए । प्रतिदिन हमारी जिंदगी में कोई न कोई मुसीबत मुंह बाए खड़ी हो जाती है ऐसे में स्वयं को स्थिर रखना वाकई मुमकिन सा नही लगता तो क्या हम हमेशा कुंठाओं और कष्टों के साथ जिएं? क्या करें की हमारे जीवन को हम एक ठहराव प्रदान कर सकें और यूं हर मुसीबत से विचलित होकर बार बार स्वयं को जीवन पथ पर अग्रसर होने से रोकते रहें, ऐसे ही सवाल पहले मुझे सताते थे। स्कूल में हुई दोस्तों के साथ लड़ाई हो, मां की डांट हो या पिताजी का गुस्सा हर छोटी से छोटी चीज मुझ पर अपना प्रभाव बना लेती थी और चूंकि बाल मन इतना ज्ञानी नही होता की हमें इन चीजों से खुद ही लड़ना सीखा दे। हर वो बात जो मेरे सोच के विपरीत होती थी या कुछ भी काम जो मेरे हिसाबन नहीं होता था बस उन चीजों से बेहद दुखी हो जाती थी।

फिर समय वक्त, उम्र के साथ साथ थोड़ी परिपक्वता भी बढ़ी धीरे धीरे समझ आने लगा की हर चीज पर दुखी होना जरूरी नहीं।

घर में आध्यात्मिक माहौल होने के कारण मैं भी इससे परिचित हुई, शुरू शुरू में लगा पूजा पाठ के कर्म को ही अध्यात्म कहा जाता है पर थोड़े और ज्ञानवर्धन के साथ ये जाना की पूजा पाठ और अध्यात्म तो पूरी तरह भिन्न है। 




  • जहां पूजा-पाठ अनेक माध्यमों से जुड़ा हुआ है वहीं अध्यात्म केवल ध्यान के लिए समर्पित है
  • पूजा-पाठ में आपको अनेक प्रकार की वस्तुओं की जरूरत पड़ती है जबकि ध्यान लगाने के लिए आपको बाहरी किसी वस्तु की जरूरत नहीं है
  • पूजा-पाठ में देव मूर्ति ध्यान लगाने का साधन है जबकि
  • ध्यान का लक्ष्य केवल आंखों को बंद कर स्वयं के आत्म को साधने से है



आज के समय में भक्ति और अध्यात्म का फर्क बहुत लोग नहीं जान पाते हैं कारण ये है की अब हमारी संस्कृति में हमें कोई दिलचस्पी नहीं रही, हम सब भेड़ के झुंड की तरह बस पाश्चात्य संस्कृति की और बढ़ते जा रहे हैं ।


यह ध्यान ही वो साधना थी जिसके माध्यम से हमारा सनातन धर्म, शीर्ष पर है इतने वर्षों से यह अडिग है अटल है। हजारों करोड़ों साल पूर्व ही हमें यह ज्ञात हो चुका था की पृथ्वी का आकार कैसा है अथवा गुरुत्वाकर्षण क्या है। हमने यह जान लिया था प्रकृति ही हमारा आधार है और इसे पूजना ही हमारा कर्तव्य है। वो हम ही हैं जिन्होंने सूक्ष्म से सूक्ष्म जीवों में जीवन होने की बात कही थी, पेड़ , पौधे, अन्न पृथ्वी हर चीज पूजनीय है हमारे लिए हमने तो घास को भी "हरिद्रा" का नाम दिया हर चीज को हमने भगवान का अंश माना है और यही वो करण है की सनातन धर्म में प्रकृति को जीवन का आधार माना गया है। पेड़ों की पूजा, पक्षियों को देवता की संज्ञा, पृथ्वी को मां कहने वाले हम ही तो हैं। 


सनातन धर्म ही मृत शरीर को जलाने के कॉन्सेप्ट को पेश करता है केवल हमारे धर्म में ही शव को अग्नि दाह किया जाता है ।



इसके पीछे ये कारण है की ये एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें मानव शरीर को जलाकर राख कर दिया जाता है। इस प्रक्रिया में शव जलकर वाष्पीकरण और ऑक्सीकरण  के माध्यम से  अपने मूल रासायनिक यौगिकों  जैसे गैसों, राख और खनिज रूप में पृथ्वी में वापस मिल जाता है ,हड्डियों के रूप में केवल ठोस शेष रह जाता है इसे प्रकृति में संतुलन बनाए रखने के रूप में परिभाषित किया गया है।



सनातन धर्म ने यह परिभाषित किया है की हमारा शरीर पांच मूल तत्वों से मिलकर बना है, अग्नि, वायु,आकाश, जल और पृथ्वी।



शव को जलाने के पीछे यही तर्क है अग्नि के स्पर्श से शरीर के अग्नि तत्व उससे मिल जाता है,जल, वायु और आकाश ऑक्सीकरण और वाष्पीकरण के माध्यम से आकाश और वायु में मिल जाता है और पृथ्वी के रूप में ठोस हड्डी और राख पृथ्वी में मिल जाते हैं।


इस प्रकार की उन्नत व्याख्या आपको और कहीं नहीं सुनने को मिलेगा और इसी कारण से इसने सम्पूर्ण दुनिया का ध्यान अपनी तरफ खींचा है। सनातन धर्म ही हमें स्व के अध्ययन के महत्व से अवगत कराता है जो एकमात्र तरीका है खुश रहने का।


अपने जड़ों से जुड़े रहें और अपनी महत्ता को पहचानें आत्मिक और मानसिक रूप से स्वस्थ बनकर एक स्वस्थ और मानसिक तौर पर मजबूत समाज का निर्माण करें।आज से ही अध्यात्म से जुड़े और सदैव खुश रहें।

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