Thursday, March 25, 2021

What is fake Feminism - in Hindi

Feminism क्या है।

 ऐसा विश्वास या सिद्धांत कि स्त्रियों को पुरुषों के समान अधिकार और अवसर प्राप्त होने चाहिए, नारीवाद कहलाता है

पर क्या ऐसा होना आपको संभव दिख रहा है?

दरअसल, हर बार ये देखा जाता है की हर कानून और नियम किसी एक विशेष स्थिति को बेहतर बनाने के उद्देश्य से किया जाता है और कुछ समय बाद उस कानून या नियम में उसकी खुद की खामियां आ जाती है। इन्ही में से एक है फेमिनिज्म, जहां कुछ बहादुर महिलाएं, दुनियाभर में महिलाओं की स्थिति को बेहतर बनाने के लिए संघर्ष कर रही है वहीं कुछ तुष्टिकरण की नीति अपनाने वाली इसका उपयोग केवल अपने स्वार्थ पूर्ति के लिए करती है।


फेक फेमिनिज्म से होने वाले नुकसान

आप भी किसी न किसी ऐसे मामले से जरूर परिचित होंगे जहां एक महिला की झूठी शिकायत या मुकदमे की वजह से किसी पुरुष की जिंदगी बर्बाद हो गई हो।

दिल्ली की घटना जहां एक जसलीन कौर नाम की महिला ने एक पुरुष पर अनेक इल्जाम लगाए और सबूत के तौर पर केवल एक फोटो ही पेश कर पाई चूंकि इन्होंने सोशल मीडिया पर अपना दुखड़ा सुनाया तो तो सोशल मीडिया अदालत और जनता जज बन बैठी और सबने मिलकर सर्वजीत सिंह को दोषी करार दे दिया और खूनी, दरिंदा पता नही क्या क्या उपनाम दे दिया। पीड़िता मैडम शिकायत करके कनाडा निकल गईं और किसी तारीख पर अदालत नही पहुंची जबकि सर्वजीत सिंह ने सभी तारीख पर अपनी उपस्थिति दर्ज करवाई और उनके और उनके परिवार ने जो मानसिक यातनाएं सही होंगी उनके बारे में क्या ही कहें।


इन सब की भरपाई कौन करेगा और उस व्यक्ति के जिंदगी में होने वाली क्षति को कौन पूरा करेगा। उसे उस झूठे मुकदमे में फंसाने के बाद उसके परिवार के मान को हुई हानि का बदला, उसकी बेवजह, बिना किसी जुर्म के कैद में बीती उस उम्र का क्या जो उसने यूं ही गुजार दिया किसके पास जवाब है इसका?

यदि आप इंटरनेट खंगालेंगे तो ऐसी अनेक घटनाओं से आप परिचित होंगे जब हम एक समाज के रूप में असफल रहे।


कौन से फेमिनिज्म की हमें जरूरत नहीं है


अभी हाल में हुआ ये वाक्या तो अभी तक आपको याद होगा किस तरह बेंगलुरु कि रहने वाली हितेषा चंद्रनी ने केवल एक


 फ्री पिज्जा पाने के लिए फेमिनिज्म की चादर ओढ़कर अपना उल्लू सीधा करना तो चाहा था पर इस बार समय रहते लोगों को समझ आ गया कि सिक्के के दोनों पहलू को देखकर ही सही और गलत का फैसला लेना चाहिए।सोशल मीडिया पर चले लंबे बहस के बाद आखिरकार जनता डिलीवरी बॉय के


सपोर्ट में आई और पीड़िता का असली चेहरा सामने आया पर चूंकि हितेषा जी को भूख लगी थी सो वो डिलीवरी बॉय की नौकरी खा गईं।

एक तरफ जहां हितेषा चंद्राणी को लाखों की संख्या में सोशल मीडिया पर फॉलोअर्स मिले वहीं कामराज (डिलीवरी बॉय)अपनी आमदनी का जरिया खो बैठा।


किस फेमिनिज्म की हमें जरूरत है

डॉक्टर नूरी परवीन, हैदराबाद के कडप्पा से हैं जो अपने मरीजों का दस रुपए के मामूली फीस लेकर इलाज करती हैं।उनके पास कुछ मरीज ऐसे आते हैं जिनकी समस्या ही भूख से उत्पन्न हुई होती है तो डॉक्टर साहिबा उनके भूख का भी इंतजाम करती है। 


जिस वक्त आधुनिक उपकरणों से लैस अस्पतालों वाले डॉक्टर वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए इलाज कर रहे थे उस वक्त भी डॉक्टर नूरी परवीन का क्लिनिक खुला ही था और वो मरीजों की सेवा में तत्पर थीं। महज दस रुपए की फीस लेकर इतने लगन से इंसानियत की सेवा ।करने वाली महिला पर पूरे हिंदुस्तान को गर्व होना चाहिए


  डॉक्टर परवीन अपने पेशेंट से 10 रु और उसके 50 रु प्रति बिस्तर चार्ज करती हैं जो निहायती सराहनीय है। वह हर दिन कम से कम 40 मरीजों का इलाज करती है। वो कहती हैं कि मानवता की सेवा करने की प्रेरणा उन्हें उनके माता-पिता से मिलती है, जिन्होने उन्हें जरूरतमंदों की मदद करना सिखाया है।


 इनका नाम आपमें से शायद ही किसी ने सुना हो क्योंकि इनका कोई सोशल मीडिया अकाउंट नहीं है और न ही लाखों की संख्या में इनको लोग फॉलो करते हैं पर इन सबसे उन्हें ज्यादा मतलब नहीं है वो अपने कार्य में लगे हैं स्वार्थता से परे।

यह आप पर मैं छोड़ती हूं की आप कौन सी विचारधारा को सपोर्ट करते हैं पर इस समाज को सचमुच बहुत सारी नूरी परवीन की जरूरत है ना की हितेषा चंद्रानी की। इनके उत्थान से ही हम नरिवादिता को उसके अलग मुकाम तक लेकर जा सकते हैं।



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